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Sunday, 18 January 2015

Christmas 2014 Day 9 of 11, Dhauligiri

01-January-2015
With the near year's dawn it was almost our time to wind up the trip. This was the last day  in Bhubaneswar and then we start out journey back home. It was raining heavily in Bhubaneswar and we did not really feel like going anywhere. Finally after dithering for a long time, we decided to visit one last place.
02:15 PM Got ready for left for Dhauli giri. This place is famous for a Shanti Stupa and Asoka's rock edicts.


2:45 PM We reach the shanti stupa on the top of the hill.
Shanti Stupa






There isn't much to see in Shanti Stupa. It is supposed to be a peaceful place but because of public holiday on the way we reached, it was extremely crowded. We drive down the hill and take a left turn near the Asoka Edicts. There is a Asoka pillar and many statues of Buddha.











We leave our car parked near the Asoka pillar and then go to the complex with Asoka Edicts.


Rock with Asoka Edicts
Rock with Asoka Edicts
The top of Asoka Edict Rock (Gajjottam)
Here is the text that is on the Asoka Edict rock and on the signboard at the entrance. One can only wish if today's ruler are able to appreciate and follow these teachings.

Rock Edicts of Asoka
Discovered in the year 1837 by Lt. M. Kittoe, the set of Rock Edicts contain eleven out of the well known fourteen Rock Edicts of Asoka (BC. 273-236). The language of the edicts is Magadhi Prakrita and the script being the early Brahmi. Here the omission of the thirteenth edicts is deliberate as it describes Asoka's conquest of Kalinga involving a great carnage, captivity and misery of the people. The Kalinga war was the turning point in his career and he not only gave up his ambition of Digvijaya but also converted him into Dharmasoka from Chandasoka. In place of the eleventh, twelfth and thirteenth rock edicts, two special edicts known as Separate Rock Edicts or Kalinga Edicts have been incorporated here which are conciliatory in nature and meant for the pacification of the newly conquered people of Kalinga. On the rock above the inscription, is the sclupted forepart of an elephant carved out of live rock which symbolizes Buddha, the "best of elephants" (Gajottama) as in this form he was believed to have entered his mother's womb in dream. Summary of the contents of Asokan Edicts are as follows:
  • R.E.I - Prohibition of killing of animal in the kingdom including his royal kitchen and imposition of restrictions on festive occasions (Samaja).
  • R.E.II - Arrangements were made both for human and animal beings for medicinal treatments and plantation of medicinal herb both in his and bordering kingdoms. Planted trees and dug wells on the road sides.
  • R.E.III - Ordered his officials to set out on tour every five years to propagate moral codes among his subjects
  • R.E.IV - Ordered his officials to promote the practice of morality and compassion among his subjects and wished that these practice would be followed by his descendants.
  • R.E.V - Appointed Mahamatras from all sects to establish and promote morality.
  • R.E.VI - Ordered his officers to report him on matters of administration related to the affairs of the people at all times and at all places.
  • R.E.VII - Self control and purity of mind are objects of attainment for all sects.
  • R.E.VIII - On the tenth year of his anointment he went out to Sambodhi which was followed by visit to the Brahmanas and Sramanas, helped the poor and propagate morality
  • R.E. IX - Recommended the practice of morality, conssting of courtesy to slaves and servants, reverence to elders, gentleness to animals and liberality to Brahmanas and Sramanas
  • R.E. X - Proclaimed that morality is the only act of fame and glory
  • R.E. XIV - Inscribed way of morality at various places in his vast empire according to the subject matter and places.
Special Rock Edicts
  1. Address the Mahamatras of Toshali, Asoka proclaims that all his subjects are just like his own children and he wishes their welfare and happiness both in this world and the other as he desires for his own children. He ordered his officials to be free from anger and hurry so that nobody will be punished without trial.
  2. He ordered the Mahamatras of Toshali to assure his piety to the unconquered border territories of forest region (Atavikas)
अशोक के शिलालेख
सन १८३७ में लेफ्टीनेंट मार्खम किट्टो के द्वारा खोजा गया इस शिलालेख में अशोक के सुप्रसिद्ध चतुर्दश शिलानुशासनों में से ग्यारह को लिपिबद्ध किया गया है। त्रयोदश शिलानुशासन को यहाँ पर स्थापना न करने का उद्देश्य है क्योंकि शिलानुशासन में मौर्य सम्राट अशोक के (२७३ - २३६ ई पू) कलिङ्ग विजय तथा उसकी विभीषिका एवं जनसाधारण के दुख़ दुर्दशा  के बारे में वर्णन किया गया है। यह कलिङ्ग युद्ध सम्राट अशोक  के जीवन के गतिपथ  सम्पूर्ण रूप से परिवर्तन करके उनके दिग्विजय होने की आकांक्षा को सम्पूर्ण पृषभीत किया था और वे चंडाशोक से धर्माशोक में परिवर्तित हो गए थे।  धउली में दो शिलालेख कलिङ्ग के जनसाधारण को सांत्वना का उदाहरण हैं। 
शिलालेख उपर एक हस्ती का अग्रभाग उत्खनित हुआ है  जो कि भगवान बुद्ध का प्रतीक माना जाता है क्योंकि भगवान बुद्ध की  गजोत्तम के रूप में विवेचना की जाती है। वो सपनों में हस्ति के रूप में मातृदेवी के गर्भ में प्रविष्ट हुए थे ऎसा विशवास किया जाता है। 
अशोक के शिलालेखों का संक्षिप्त विवरण
  • प्रथम शिलालेख : किसी भी पशु  वध न किया जाए तथा राजकीय एवँ "मनोरंजन तथा उत्सव" न किये जाने का आदेश दिया गया है । 
  • द्वितीय शिलालेख : मनुष्यों और पशुओं के लिए चिकित्सालय खुलवाना और उनमें औषधि की व्यवस्था करना। मनुष्यों एवँ पशुओं के के कल्याण के लिए मार्गों पर छायादार वृक्ष लगवाने तथा पानी की व्यवस्था के लिए कुँए खुदवाए। 
  • तृतीय शिलालेख : राजकीय पदाधिकारियों को आदेश दिए गए हैं कि प्रति पाँच वर्षों के बाद धर्म प्रचार के लिए दौरे पर जायें। 
  • चतुर्थ शिलालेख : राजकीय पदाधिकारियों को आदेश दिए गए हैं कि व्यवहार के सनातन नियमों यथा - नैतिकता एवं दया -  का सर्वत्र प्रचार प्रसार किया जाए । 
  • पञ्चम शिलालेख : इसमें धर्ममहामात्रों की नियुक्ति तथा धर्म और  नैतिकता के प्रचार प्रसार के आदेश का वर्णन है । 
  • षष्ट शिलालेख : राजकीय पदाधिकारियों को स्पष्ट आदेश देता है कि सर्वलोकहित से सम्बंधित कुछ भी प्रशासनिक सुझाव मुझे किसी भी समय या स्थान पर दें । 
  • सप्तम शिलालेख : सभी जाति, सम्प्रदाय के व्यक्ति सब स्थानों पर रह सकें क्योंकि वे सभी आत्म-संयम एवं ह्रदय की पवित्रता चाहते हैं । 
  • अष्टम शिलालेख : राज्यभिषेक के दसवें वर्ष अशोक ने सम्बोधि (बोधगया) की यात्रा कर धर्म यात्राओं का प्रारम्भ किया। ब्राम्हणों एवं श्रमण के प्रति उचित वर्ताव करने का उपदेश दिया गया है ।  
  •  नवम शिलालेख : दास तथा सेवकों के प्रति शिष्टाचार का अनुपालन करें, जानवरों के प्रति उदारता, ब्राह्मण एवं श्रमण के प्रति उचित वर्ताव करने का आदेश दिया गया है । 
  • दशम शिलालेख : घोषणा की जाए की यश और कीर्ति के लिए नैतिकता होनी चाहिए । 
  • चतुर्दश शिलालेख : धर्म प्रचानार्थ अशोक अपने विशाल साम्राज्य के विभिन्न स्थानों पर शिलाओं के उपर धम्म लिपिबद्ध कराया जिसमें धर्म प्रशासन संबंधी महत्वपूर्ण सूचनाओं का विवरण है । 
पृथक शिलालेख
  • प्रथम पृथक शिलालेख :- तोशाली के महामात्रों को सम्बोधित करते हुए अशोक आदेश देता है कि सभी प्रजा मेरी संतान हैं । जिस प्रकार मैं अपनी संतान के लिए इच्छा करता हूँ कि इहलोक और परलोक में उनकी सुख समृद्धि हो उसी प्रकार सभी प्रजा के लिए मेरी इच्छा है । बिना उचित कारण के किसी को शारीरिक दंड, ईर्ष्या, क्रोध आदि दुर्गुणों से रहित निस्पक्ष मार्ग का अनुकरण करने का उपदेश देता है । 
  • द्वितीय पृथक शिलालेख : तोशाली के महामात्रों आदेश देता है की सीमांत राज्यों के लोगों के हित - कल्याण को ध्यान में रखा जाय और उन पर अनुग्रह की नीति अपनाई जाए । 
3:40 PM We finally leave the place back to hotel.
4:30 PM We reach back hotel. The tourism portion of the vacation is over and only thing remaining is the drive back.

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